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संसद में आवाज़ को दबाने की कोशिश लोकतंत्र के लिए ख़तरा

संसद में आवाज़ को दबाने की कोशिश लोकतंत्र के लिए ख़तरा


संसद में आवाज़ को दबाने की कोशिश लोकतंत्र के लिए ख़तरा

सांसद हनुमान बैनीवाल का वक्तव्य | संसद भवन परिसर

लोक सभा में हाल ही में 8 सांसदों के निलंबन की जो कार्यवाही की गई, उसका मैं स्पष्ट और सख़्त विरोध करता हूँ।
सांसदों को इस प्रकार निलंबित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

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संसद केवल एक भवन नहीं है,
यह वह मंच है जहाँ देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा रखती है कि वे उनकी समस्याएँ, उनकी पीड़ा और उनके सवाल सदन के पटल पर रखें।
अगर सांसद ही बोलने से रोके जाएंगे,
तो जनता की आवाज़ कहाँ जाएगी?

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज सत्ता पक्ष लोक सभा में विपक्ष की बात सुनने तक को तैयार नहीं है।
लोकतंत्र में सत्ता का दायित्व केवल निर्णय लेना नहीं,
बल्कि सवाल सुनना और उनका उत्तर देना भी होता है।

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आज स्थिति यह बनती जा रही है कि
सत्ता पक्ष खुद यह चाहता है कि सदन में अव्यवस्था बनी रहे,
ताकि बिना बहस, बिना विमर्श
सरकार अपनी मनमर्जी से फैसले करती रहे।

लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष का एक संवैधानिक और संसदीय विशेषाधिकार होता है।
नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी जो बात सदन में रख रहे थे,
वह न तो असंसदीय थी,
न ही ऐसी कोई बात थी जो लोक सभा में नहीं कही जा सकती।

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इसके बावजूद उन्हें बोलने से रोका गया—
यह केवल एक व्यक्ति को नहीं,
बल्कि पूरे विपक्ष और लोकतांत्रिक परंपरा को रोकने जैसा है।

एक स्वस्थ और स्वच्छ लोकतंत्र में
सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि
सिर्फ बोलने का अधिकार होना पर्याप्त नहीं है,
सुनने की आदत भी विकसित करनी पड़ती है।

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क्योंकि
वाद-विवाद से ही
तथ्य सामने आते हैं,
नीतियों की परीक्षा होती है
और लोकतंत्र मजबूत बनता है।

यदि सवाल पूछना अनुशासनहीनता कहलाएगा,
यदि असहमति को दंडित किया जाएगा,
तो संसद बहस का मंच न रहकर
केवल औपचारिकता का केंद्र बनकर रह जाएगी।

हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि
लोकतंत्र चुप्पी से नहीं, संवाद से चलता है।
जनता की आवाज़ को दबाने की हर कोशिश का
लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा।


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