संसद के पहले ही दिन हंगामा: मध्य-पूर्व संकट और वैश्विक हालात पर गरमाई राजनीति
9 March 2026 20:42 IST
| लेखक:
The Pillar Team
Parliament

भारत की संसद में नए सत्र की शुरुआत अक्सर महत्वपूर्ण बहसों और नीतिगत चर्चाओं के साथ होती है, लेकिन इस बार सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में जोरदार हंगामा देखने को मिला। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के कारण सदन की कार्यवाही बाधित हो गई और आखिरकार स्पीकर को बैठक स्थगित करनी पड़ी।
संसद में यह विवाद मुख्य रूप से मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, तेल आपूर्ति की संभावित समस्या और भारत की विदेश नीति को लेकर उठा। विपक्षी सांसदों ने इन मुद्दों पर तत्काल चर्चा की मांग की और जोरदार नारेबाजी करते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा।
स्पीकर का बार-बार शांति बनाए रखने का आग्रह
लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसद खड़े हो गए और उन्होंने मध्य-पूर्व की स्थिति पर चर्चा की मांग की। स्पीकर जगदंबिका पाल जी ने कई बार सदस्यों से शांति बनाए रखने और संसदीय परंपराओं के अनुसार अपनी बात रखने का आग्रह किया।
स्पीकर ने यह भी कहा कि यदि विपक्ष के पास कोई मुद्दा है तो वह नियमों के तहत चर्चा कर सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यदि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है तो उस पर भी चर्चा की जा सकती है।
लेकिन विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी जारी रखी और सदन में शोर-शराबा बढ़ता गया।
संसदीय कार्य मंत्री की अपील
संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju ने भी विपक्ष से अपील की कि संसद बहस के लिए होती है और यदि कोई मुद्दा है तो उस पर चर्चा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार चर्चा से पीछे नहीं हट रही है और विपक्ष को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए।
इसके बावजूद विपक्षी सांसद अपनी मांगों पर अड़े रहे और उन्होंने सदन में लगातार विरोध जारी रखा।
विदेश मंत्री का बयान, लेकिन विपक्ष संतुष्ट नहीं
मध्य-पूर्व के मुद्दे को गंभीर मानते हुए विदेश मंत्री S. Jaishankar ने सदन में आकर स्थिति पर बयान भी दिया। उन्होंने क्षेत्र में चल रहे तनाव और भारत की कूटनीतिक स्थिति के बारे में जानकारी देने की कोशिश की।
हालांकि विपक्षी दलों का कहना था कि सरकार को इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करनी चाहिए, क्योंकि इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
विपक्ष का तर्क था कि यदि मध्य-पूर्व में संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ेगा।
वैश्विक तनाव और भारत की चिंता
मध्य-पूर्व में हाल के दिनों में तनाव तेजी से बढ़ा है। कई देशों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है और वैश्विक बाजार भी इस संकट को लेकर चिंतित हैं। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर करता है।
इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं। ऐसे में वहां की किसी भी अस्थिरता का असर भारतीय नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है।
इसी वजह से विपक्ष का कहना है कि संसद में इस मुद्दे पर गंभीर और विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री पर विपक्ष के आरोप
संसद के अंदर और बाहर विपक्ष ने प्रधानमंत्री Narendra Modi की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए। कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार अंतरराष्ट्रीय मामलों में पर्याप्त स्पष्टता नहीं दिखा रही है।
विपक्ष का यह भी कहना है कि भारत को वैश्विक मंच पर अधिक मजबूत और स्वतंत्र रुख अपनाना चाहिए।
हालांकि सरकार की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि भारत की विदेश नीति संतुलित और रणनीतिक है तथा देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है।
संसद के बाहर भी जारी रहा विरोध
सदन के अंदर हंगामे के बाद विपक्षी सांसद संसद परिसर में भी एकत्र हुए। उन्होंने झंडे, पोस्टर और बैनर लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और अपनी मांगों को दोहराया।
विपक्षी नेताओं का कहना था कि संसद देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का मंच है और सरकार को इन सवालों से बचने के बजाय जवाब देना चाहिए।
अंततः स्थगित करनी पड़ी कार्यवाही
लगातार हंगामे और नारेबाजी के कारण स्पीकर को लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 3 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संसद में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर शांतिपूर्ण और गंभीर चर्चा संभव हो पा रही है।
लोकतंत्र में बहस की आवश्यकता
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद और बहस होती है। संसद इसी उद्देश्य से बनाई गई है कि देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सभी पक्ष अपनी बात रख सकें और समाधान खोजा जा सके।
लेकिन जब बहस की जगह शोर और टकराव ले लेता है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।
आज की घटना ने यह सवाल फिर से सामने ला दिया है कि क्या संसद को राजनीतिक टकराव का मंच बनने के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर विमर्श का केंद्र बनना चाहिए।

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