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खेजड़ी बचाने की लड़ाई : संसद से सड़क तक जनप्रतिरोध

खेजड़ी बचाने की लड़ाई : संसद से सड़क तक जनप्रतिरोध


राजस्थान के बीकानेर ज़िले में खेजड़ी को बचाने के लिए चल रहा जन-आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर गूंजने लगा है। आज लोक सभा में इस आंदोलन का मुद्दा पूरी गंभीरता और मजबूती के साथ उठाया गया। इस विषय पर नगीना से सांसद श्री चंद्रशेखर आज़ाद, बिहार से सांसद श्री सुदामा प्रसाद, तथा जम्मू-कश्मीर से सांसद श्री आगा सैयद रहुल्लाह मेहदी भी एकजुट होकर साथ खड़े दिखाई दिए।

सांसदों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि खेजड़ी की कटाई केवल स्थानीय प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं है, बल्कि यह मरुस्थलीय पर्यावरण, ग्रामीण आजीविका और जैव विविधता के अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

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लोक सभा के भीतर आवाज़, बाहर प्रतिरोध

सदन की कार्यवाही शुरू होते ही खेजड़ी बचाने और पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर वेल में आकर सरकार का ध्यान आकृष्ट किया गया। मांग साफ थी
👉 खेजड़ी बचाओ, पर्यावरण बचाओ।

हालांकि, लोक सभा में लगातार हो रहे हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित हो गई। इसके बाद सांसदों ने लोक सभा के बाहर आकर धरना दिया और बीकानेर में चल रहे जन-आंदोलन के समर्थन में केंद्र सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया।

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यह स्पष्ट किया गया कि संसद के भीतर और बाहर, दोनों स्तरों पर इस मुद्दे को उठाया जाएगा, ताकि सरकार पर निर्णय लेने का नैतिक और राजनीतिक दबाव बने।

केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग

केंद्र सरकार से यह मांग रखी गई कि वह राजस्थान सरकार को त्वरित निर्देश जारी करे, ताकि विधानसभा के मौजूदा सत्र में:
• खेजड़ी
• अन्य पेड़-पौधों
• और पर्यावरणीय संसाधनों

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की सुरक्षा के लिए ट्री प्रोटेक्शन एक्ट लाया जाए और आंदोलनरत लोगों की मांगों पर सकारात्मक सहमति बने।

सांसदों का कहना था कि यदि समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

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शांतिपूर्ण आंदोलन, लेकिन बढ़ती चिंता

बीकानेर में खेजड़ी बचाने को लेकर चल रहा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है। इसमें साधु-संत, किसान, पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हैं। आंदोलन का स्वर अहिंसक है, लेकिन हालात गंभीर होते जा रहे हैं।

हाल ही में आंदोलन के दौरान अनशन पर बैठे साधु-संतों की तबीयत बिगड़ने की खबरें सामने आईं। इसके बाद सांसद द्वारा साधु-संतों, श्री परसाराम जी बिश्नोई सहित आंदोलन से जुड़े लोगों से दूरभाष पर बातचीत की गई।

इस बातचीत में यह स्पष्ट किया गया कि:
👉 जो लोग प्रकृति और खेजड़ी जैसे जीवनदायी वृक्षों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनकी सेहत और सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

लोक सभा की कार्यवाही बार-बार बाधित होने के कारण यह विषय फिलहाल सदन में पुनः नहीं उठाया जा सका, लेकिन यह भरोसा दिलाया गया कि सदन सुचारू रूप से चलते ही यह मामला दोबारा मजबूती से उठाया जाएगा।

राजस्थान सरकार से सीधी अपील

राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा से अपील की गई है कि:
• विधानसभा सत्र के दौरान
• आंदोलित लोगों की भावना और मांगों को समझते हुए
• खेजड़ी और पेड़-पौधों की सुरक्षा के लिए ठोस कानून लाया जाए

सरकार की हठधर्मिता के कारण आज हजारों लोग मजबूरी में धरने पर बैठे हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

खेजड़ी : मरुस्थल की जीवनरेखा

सांसदों ने दो टूक शब्दों में कहा कि:

खेजड़ी केवल एक पेड़ नहीं है।
यह:
• रेगिस्तान की पर्यावरणीय आधारशिला
• मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा
• पशु-पक्षियों का प्राकृतिक आश्रय
• किसानों के लिए चारा
• और ग्रामीण समाज की आजीविका का मजबूत आधार है।
खेजड़ी का नाश, दरअसल मरुस्थल के संतुलन और भविष्य का नाश है।

हनुमान बेनीवाल का समर्थन और चेतावनी

नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने खेजड़ी बचाओ आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन दिया है। उन्होंने संसद में इस विषय को उठाने का प्रयास किया, लेकिन कार्यवाही बार-बार स्थगित होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।

इसके बाद उन्होंने पार्लियामेंट गेट पर अन्य सांसदों के साथ खेजड़ी बचाओ के पोस्टर लेकर विरोध प्रदर्शन किया और सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की।

हनुमान बेनीवाल ने साफ कहा कि
👉 यदि अनशन पर बैठे लोगों के स्वास्थ्य को कोई नुकसान पहुंचता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी राजस्थान सरकार की होगी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जैसे ही लोक सभा से समय मिलेगा, वे स्वयं बीकानेर पहुंचकर आंदोलन में शामिल होंगे और न्याय दिलाए बिना पीछे नहीं हटेंगे।

निष्कर्ष

खेजड़ी बचाओ आंदोलन अब केवल बीकानेर या राजस्थान का विषय नहीं रहा। यह पर्यावरण, जीवन और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है।

सरकार के सामने अब विकल्प स्पष्ट हैं
या तो समय रहते निर्णय लेकर संघर्ष को सम्मानपूर्वक समाप्त किया जाए,
या फिर यह आंदोलन और अधिक व्यापक होकर सड़कों से संसद तक गूंजता रहेगा।


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