भारत-अमेरिका एग्रीकल्चर ट्रेड डील
17 February 2026 18:50 IST
| लेखक:
The Pillar Team
India

किसान की सहमति के बिना विकास किसके लिए?
देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। ऐसे में कृषि से जुड़ा कोई भी बड़ा फैसला सिर्फ एक नीतिगत निर्णय नहीं होता, बल्कि करोड़ों परिवारों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित एग्रीकल्चर ट्रेड डील को लेकर आज देश के किसानों में गहरी चिंता है। यह चिंता किसी भ्रम पर नहीं, बल्कि अनुभव, इतिहास और मौजूदा आर्थिक हालात पर आधारित है।
सरकार इस समझौते को व्यापार और विकास के अवसर के रूप में प्रस्तुत कर रही है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि भारतीय किसान पहले ही लागत, कर्ज़ और अनिश्चित बाज़ार से जूझ रहा है। बीज, खाद, डीज़ल, बिजली और सिंचाई—हर स्तर पर खर्च बढ़ रहा है, जबकि फसल का उचित मूल्य मिलना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे हालात में एक ऐसी ट्रेड डील, जो सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाज़ार खोल दे, किसान के लिए खतरे की घंटी है।
असमान मुकाबला: सब्सिडी बनाम संघर्ष
अमेरिकी कृषि व्यवस्था और भारतीय कृषि व्यवस्था के बीच मूलभूत अंतर है। अमेरिका में किसान को भारी सरकारी सब्सिडी, आधुनिक तकनीक, बीमा सुरक्षा और सुनिश्चित बाज़ार उपलब्ध है। इसके विपरीत भारत का किसान मौसम, मंडी और नीति—तीनों के भरोसे जीता है। जब सब्सिडी से तैयार सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पाद भारत में आयात होंगे, तो स्वाभाविक है कि देशी फसलों के दाम दबाव में आएंगे।
इसका सीधा असर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर पड़ेगा। MSP पहले से ही कानूनी संरक्षण के अभाव में कमजोर स्थिति में है। सस्ते आयात के दबाव में MSP और भी अप्रासंगिक होती चली जाएगी। सबसे ज्यादा मार छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगी, जिनके पास न भंडारण की सुविधा है, न सौदेबाज़ी की ताकत।

आयात निर्भरता और कॉरपोरेट नियंत्रण का खतरा
यह ट्रेड डील भारत को धीरे-धीरे आयात-निर्भर कृषि व्यवस्था की ओर ले जाने का रास्ता खोलती है। आज अगर दाल, तिलहन, मक्का या अन्य फसलें बड़े पैमाने पर आयात होने लगेंगी, तो देशी उत्पादन घटेगा। जब उत्पादन घटेगा, तो किसान खेती छोड़ने को मजबूर होगा। इसका फायदा कॉरपोरेट कंपनियों को होगा, जो आयात, भंडारण और वितरण पर नियंत्रण स्थापित करेंगी।
खेती का चरित्र बदल जाएगा—किसान उत्पादक नहीं, बल्कि ठेके पर काम करने वाला मज़दूर बनकर रह जाएगा। उसकी सौदेबाज़ी शक्ति खत्म होगी और फसल, कीमत और बाज़ार के फैसले खेत से दूर कॉरपोरेट दफ्तरों में लिए जाएंगे।
खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
यह मसला सिर्फ किसान की आमदनी तक सीमित नहीं है। खाद्य सुरक्षा किसी भी देश की संप्रभुता का आधार होती है। अगर भारत अपनी बुनियादी खाद्य ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर होता गया, तो भविष्य में वैश्विक संकट, युद्ध या बाज़ार अस्थिरता के समय देश गंभीर जोखिम में पड़ सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी इससे बुरी तरह प्रभावित होगी। खेती से जुड़े कारीगर, मज़दूर, छोटे व्यापारी और ग्रामीण सेवा क्षेत्र—all इस दबाव की चपेट में आएंगे। गाँव कमज़ोर होगा, तो शहरों पर भी उसका बोझ बढ़ेगा।
किसान विरोधी नहीं, अनदेखी के विरोधी हैं
यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि किसान विकास या व्यापार के विरोधी नहीं हैं। वे भी आधुनिकता, तकनीक और बाज़ार तक पहुंच चाहते हैं। लेकिन किसी भी समझौते से पहले किसानों को भरोसे में लेना, उनकी आशंकाओं को सुनना और उन्हें संरक्षण देना सरकार की ज़िम्मेदारी है।
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत का कहना है कि इस एग्रीकल्चर ट्रेड डील से भारतीय किसान, विशेषकर लघु और सीमांत किसान, और अधिक परेशान होंगे। उनका साफ़ मत है कि सरकार को ऐसे किसी भी समझौते से पहले किसानों से व्यापक बातचीत करनी चाहिए थी। यह बयान किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत से उपजा है।
निष्कर्ष: सहमति के बिना समझौता नहीं
खेती कोई साधारण व्यापार नहीं है। यह करोड़ों परिवारों का जीवन, संस्कृति और सुरक्षा है। किसानों की सहमति और संरक्षण के बिना किया गया कोई भी एग्रीकल्चर समझौता किसान हित में नहीं हो सकता। सरकार को चाहिए कि वह इस ट्रेड डील के हर पहलू को सार्वजनिक करे, किसानों से संवाद करे और यह सुनिश्चित करे कि भारतीय कृषि, किसान और खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
The Pillar Live मानता है कि लोकतंत्र में नीतियां बंद कमरों में नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी से बनती हैं। जब सवाल किसान का हो, तो जवाब भी किसान के साथ खड़े होकर ही दिया जाना चाहिए।

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